रविवार, 6 नवंबर 2011

महेश्वर हाईड्रो पावर कारपोरेशन जमीन अधिग्रहण संशोधन से राहत की आस

महेश्वर हाईड्रो पावर कारपोरेशन जमीन अधिग्रहण संशोधन से राहत की आस
भोपाल 5 नवंबर 2011।। महेश्वर हाईड्रो पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने जमीन अधिग्रहण संशोधन कानून बनने के बाद से राहत की उम्मीद जताई है। कारपोरेशन का कहना है कि जमीन अधिग्रहण से किसे कितना फायदा व कितना नुकसान हो रहा है,इसे देखने की जरूरत होती है, पर कुछ संस्थाएं अपने फायदे के लिए इसका विरोध कर रही है। जमीन अधिग्रहण हाल ही में एक बहुत ही पेचीदा मसला बन कर उभ्रा है। किसानों द्वारा जमीन अधिग्रहण का विरोध करना पूर्ण रूप से सही नहीं है। अधिग्रहण को दो अलग पेहलू से देखना होगा।
वर्तमान में अधिग्रहण सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण कानून 1894 के तहत् किया जाता है। कानून के प्रावधानों के अनुसार सरकार को कोई भी जमीन के अधिग्रहण का अधिकार है। अधिग्रहण प्रक्रिया के तहत् जमीन मालिक से चर्चा तो की जाती है किन्तु जमीन मालिक को अधिग्रहण को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। अगर जमीन का अधिग्रहण ‘‘जन सेवा’’ हेतु होता है तो जमीन मालिक या किसान को वर्तमान दरों के मुताबिक मुआवजा दिया जाता है। किसान द्वारा अधिग्रहण का विरोध वर्तमान में इसलिये बढ़ा है क्योंकि सरकारों ने निजी कम्पनियों को देने के लिये जमीन का अधिग्रहण करना शुरू कर किया है। इसके कारण मुआवजे में भी गड़बड़िया हो रही है। जमीन अधिग्रहण (संषोधित) अधिनियम में पूर्व कानून की विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया गया है। कानून में ‘‘जन कार्य’’ से जुड़ी विसंगतियों को दूर किया जाना प्रस्तावित है। अधिनियम में ‘‘जन कार्य’’ में अधिग्रहण सिर्फ डिफेन्स कार्य हेतु किया जा सका है,
अधोसंरचना विकास या आम जनता के उपयोग हेतु हो। किन्तु ऐसा अधिग्रहण में 70 प्रतिशत जमीन इच्छुक बेचवालों से खरीदी जा चुकी है बाजार भाव पर संशोधित प्रस्तावित अधिनियम में निजी कम्पनियों हेतु अधिग्रहण प्रतिबंधित है किन्तु अगर निजी कम्पनी द्वारा 70 प्रतिशत जमीन बाजार भाव से खरीदी जा चुकी है तो बाकी जमीन अधिग्रहण की जा सकेगी।
रीहेबिलिटेशन और रीसैटलमेंट कानून 2007 में विस्थापितों को मुआवजा व अन्य फायदे देने का प्रावधान है। किन्तु इस कानून में कुछ जरूरी प्रावधानों को नज़रअंदाज किया गया है। ज्ञात रहे देहात में 60 प्रतिषत आबादी जमीन विहीन है। 20 प्रतिषत आबादी छोटा किसान है औश्र इस किसानों पर बहुत कम जमीन है। गावों में अधिकांश जमीन 20 प्रतिशत उच्च जाती वर्ग के पास है या ओ.बी.सी. पर है।
देहात में अजा/जजा वर्ग के लोगों पर जमीन नहीं है। इसलिये अधिकाश अधिग्रहित जमीन या तो उच्च वर्ग की है या फिर अन्य पिछड़ी जाति (ओ.बी.सी.) जीमन अधिग्रहण में जमीन मालिकों का विरोध असल में राजनीतिक दंबगता को बरकरार रखना चाहते है। वहीं जब इन बड़े जमीनदारों की जमीनें विकास कार्य हेतु अधिग्रहित की जाति है तो देहाती क्षेत्र में गरीबों के लिये बहुत सारी नौकरियों के रास्ते खुल जाते है। उदाहरण के लिये जब नर्मदा नहीं पर महेश्वर हाईड्रो - इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पूर्ण हो जायेगा तो स्थानीय अ.जा./ज.जा. लोगांे को मछली मारने के सम्पूर्ण अधिकार दिये जायेंगे। इससे उनकी आमदनी तो बढ़ेगी ही साथ ही उनकी कम मजदूरी पर काम करने की मजबूरी भी नहीं रहेगी।
लिहाजा परियोजना का विरोध कर रहे नर्मदा बचाव आंदोलन (एन.बी.ऐ.) भले ही दावा करे कि यह ‘‘किसान विरोधी’’ है। किन्तु असलीयत में यह परियोजना में विल्मय हेतु अभियान चलाया जा रहा है। इसके पीछे उद्देष्य ग्रामिणों को नौकरीयों से वंछित रखना है। यही कारण है कि प्रख्यात समाज सचेतक अरूनधति रॉय ने अपने आप को एन.बी.ए. अन्दोलन से अलग कर लिया है और मांग की है कि तालाब को अविलम्ब भरा जाय।
परियोजना में विस्थापितों को सारी सुविधाये दी जा रही है। विस्थापना लेपा, जालौद एवं सोलगॉव में किया गया है। यह प्रत्येक व्यसक व्यक्ति को 540 वर्ग मीटर जगह ग्रह निर्माण हेतु दिया गया है। अगर परिवार मुखिया के अलावा 2 व्यसक बेटे है तो उन्हे 1620 वर्गमीटर का रिहायषी भूखण्ड दिया गया है। इसमें से 1300 वर्ग मीटर जगह खेती हेतु उपयोग किया जा सकता है। इस तरह तीनों गावों के 80 प्रतिषत रहवासी जीवन में पहली बार जमीन मालिक बने है। इस रहवासियों को पुष्तैनी खेतीहर मजदूरी से राहत मिली है। इस बदलाव को महेश्वर के बडे किसान पचा नहीं पा रहे है और इसी कारण से एन.बी.ए. द्वारा विरोध चल रहा है।
Date: 05-11-2011 Time: 16:36:26

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