बुधवार, 16 मार्च 2011

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाने की परंपरा सन् 1911 से प्रारंभ हुई। 8 मार्च 2001 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का सौ वर्ष पुर्ण होने जा रहा है। पूरे विश्व में इस दिन को महिलाओं की समस्याओं पर केंद्रित कर मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास 'समानता के अधिकार को लेकर प्रारंभ हुआ था। इतिहास यह बताता है कि महिला अधिकारों का यह आंदोलन श्रमिक वर्ग के आंदोलन से बहुत ही गहराई से जुड़ा हुआ है। 1857 में पहली बार न्यूयार्क के कपड़ा मिलों में काम करने वाली महिला कामगारों ने असहाय कार्य परिस्थितियों एवं प्रचलित 12 घंटों के कार्य दिवस के विरुद्ध लडऩे के लिए खुद को संगठित कर संघर्षों की शुरुआत की थी यह वह समय है जब पूंजीवाद का उद्भव हो चुका था। इस संघर्ष को भी शोषण आधारित पुंजीवादी व्यवस्था द्वारा पुलिस दमन से उसी निरंकुश तरीके से कुचलने की कोशिश की गई जैसे आम मजदूर आंदोलनों के साथ किया जाता है। शासक वर्ग के इस दमन ने इस बात का खुलासा कर दिया कि महिला समानता, बेहतर कार्य परिस्थितियां एवं 8 घंटे के कार्य दिवस जैसी मांगों पर महिला कामगारों का यह आंदोलन शोषण से मुक्ति के आंदोलन का ही हिस्सा है। महिलाओं के बीच भी जनतंत्र, समानता और बेहतरी की चेतना भी पूंजीवादी विकास के साथ-साथ ही विकसित हुई। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि व्यापक रूप से श्रमिक वर्ग में और विशेषत: महिला श्रमिकों में इस सत्य की जागृति आने लगी कि राजनैतिक सत्ता को हासिल करके ही र्पंजीवादी शोषण व्यवस्था का अंत किया जा सकता है। इस प्रकार महिलाओं को वोट देने के अधिकार का आंदोलन और श्रमिक वर्ग का आंदोलन आपस में एक र्दसरे से जुड़ गए और यहीं से ही महिला आंदोलन का जन्म हुआ।
8 मार्च को मनाये जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास के दो महत्वपूर्ण पहर्ल हैं पहला एवं महत्वर्पर्ण पहर्ल यह है कि पूंजीवादी शोषण के खिलाफ एवं समाजवादी विकल्प के लिए श्रमिक महिलाओं के संगठित होने की चेतना के विकास का होना, जिसने समानजनक जीवन जीने के अधिकार, समानजनक कार्यपरिस्थितियों एवं सार्वभौमिक राजनैतिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्षों की बुनियाद खड़ी की। दूसरा महत्वर्पर्ण पहल यह है कि मजदूर वर्ग की महिला कामगारों के संगठित जुझारू संघर्षों में उदारवादी बुजुर्ग महिला संगठनों के नेतृत्व, मध्यम वर्गीय पढ़ी-लिखी महिलाओं का राजनैतिक अधिकार की मांग पर (वोट देने का अधिकार) सड़कों पर उतर आना एवं र्परी दुनियां में फैल जाना। सौ साल पहले 8 घंटे कार्य दिवस, समानजनक कार्य परिस्थितियां, समान मजर्दरी एवं सार्वभौमिक मताधिकार की मांग प्रमुख मांग थी।
आज भी हमारे र्पर्वजों के संघर्षों द्वारा प्राप्त हुई महिलाओं की सार्वभौमिक स्वीकार्यता ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार तो दे दिया लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया एवं उसे र्मर्त रूप देने में बराबर की हिस्सेदारी मिलना र्परा नहीं हो पाया है। हमारे गणतंत्र के 61 वर्षों के पश्चात देश में महिलाओं ने मात्र 9-10 प्रतिशत सीटें ही प्राप्त की हैं। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में 4 प्रतिशत से भी कम सीटें महिलाओं को प्राप्त हुई हैं। साम्राज्यवादी नवउदारवादी नीतियों के लार्ग होने के बाद शहरी क्षेत्रों में महिला बेरोजगारों की संख्या 9.1 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। आज भी संगठित एवं सार्वजनिक उद्योगों में जहां बेहतर कार्य परिस्थितियां, समान वेतन, सामाजिक कल्याण की सुविधाएं एवं 8 घंटे कार्य दिवस उपलब्ध हैं, वहां महिला श्रमिकों की संख्या कुल कामगारों का 4 प्रतिशत तक ही है, लेकिन जहां श्रम कार्ननों की सुविधा, सामाजिक कल्याणकारी सुविधाएं, बदतरीन कार्य परिस्थितियां विद्यमान है वहां महिला श्रमिकों की संख्या कुल कामगारों का 40 प्रतिशत तक है।
विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं असंगठित क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति 19 वीं सदी के कपड़ा मिलों में काम कर रही महिलाओं की स्थिति को पुन: ताजा कर रही है। समान वेतन अधिनियम के अस्तित्व में होने के बावर्जद पुरुषों की तुलना में महिलाओं को 30 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 85 प्रतिशत महिलाएं सरकारी गरीबी स्तर आय का केवल 50 प्रतिशत कमाती हैं। सरकार खुद लाखों-लाख महिलाओं को 'सामाजिक कार्यकर्ता 'सामुदायिक कार्यकर्ता 'मान्यता प्राप्त कार्यकर्ता कह कर उन्हें कर्मचारी मानने से इंकार करती है तथा 1000-2000 रुपए मासिक मानदेय प्रदान करती है जो कि देश के विभिन्न राज्यों में प्रचलित न्र्यनतम मजर्दरी से भी कम है। इस तरह महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक उत्पीडऩ के जो हालात हैं, वह समाज में उनके दोयम दर्जे की स्थिति को स्पष्ट करती है। दुनिया भर में बढ़ रहे आतंकवाद, साप्रदायिकता एवं जातिवादी कट्टरता का शिकार भी आम लोगों से ज्यादा महिलाएं होती हैं। 2002 में गुजरात में हुए दंगों की वास्तविकताओं ने इसे खुलेआम पुष्ट कर दिया है। महिलाओं के समानता के संघर्ष को इस दौर में सबसे अधिक नुकसान सांस्कृतिक मोर्चे पर पहुंचा है।
साप्रदायिक एवं कट्टरवादी ताकतें महिलाओं को पुन: 16 वीं सदी की ओर धकेलने की कोशिश कर रहे हैं इससे हमें यह समझना होगा कि लैंगिक समानता का संघर्ष जनतांत्रिककरण एवं धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए महिला आंदोलन का ही हिस्सा है। इस आंदोलन में हिस्सेदारी किए बिना लैंगिक समानता का संघर्ष अपने लक्ष्यों तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो पाएगा। जनतांत्रिक एवं धर्म निरपेक्षीकरण आंदोलन की मुख्य धुरी र्परी दुनिया एवं हमारे देश में मजर्दर आंदोलन रहा है जो वर्गीय चेतना एवं सामाजिक चेतना से लैस होकर आगे बढ़ता है। अत: महिलाओं को भी मजर्दर वर्ग के आंदोलन में व्यापक हिस्सेदारी कर समानता के अधिकार के आंदोलन को मजर्बत करते रहना होगा तभी 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सारर्भत तत्वों एवं र्मल्यों की रक्षा की जा सकेगी, नहीं तो साम्राज्यवादी, र्पंजीवादी, सा प्रदायिक, अलगाववादी ताकतें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सारे तत्वों को कमजोर करते हुए व्यावहारिक एवं कट्टरपंथी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करेंगे।
आइए 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस शताब्दी वर्ष को इस दिवस के र्मल चरित्र की रक्षा के लिए शोषण और उत्पीडऩ के खिलाफ, निर्णयकारी संस्थाओं में हिस्सेदारी एवं समानता के अधिकार के संघर्षों के रूप में मनाये एवं जागरूकता अभियान चलाएं।

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