मंगलवार, 8 मार्च 2011

आदिवासी महिलाएं एकजुटशराब के खिलाफ

भोपाल, जागरण ब्यूरो। पढ़े लिखे और सभ्य माने जाने वाले समाज के लिए अशिक्षित आदिवासी महिलाओं का यह प्रयास प्रेरणा का काम कर सकता है। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल दो जिलों के आधा दर्जन से ज्यादा गांवों में महिलाओं द्वारा शराब के खिलाफ छेड़े गए अभियान का असर दिखने लगा है। इस अभियान के तहत वे बड़े अफसरों से मिल रही है, थानों का घेराव कर रही हैं, अपने शराबी पतियों को घर में नहीं घुसने दे रही हैं, यहां तक कि शराब को प्रोत्साहित करने वालों पर अर्थदंड लगाने से भी पीछे नहीं हट रही हैं। महिलाओं की कोशिशों के चलते कुछ गांव तो खुद को नशामुक्त भी घोषित कर चुके हैं।

कहा जाता है कि महिलाएं लक्ष्मी का रूप होती हैं। इस धारणा को सही साबित किया है धार और बालाघाट जिले की ग्रामीण आदिवासी महिलाओं ने। ये महिलाएं शराब और शराबखोरों के पीछे हाथ धो कर पड़ गई हैं। धार जिले में कुक्षी तहसील की महिलाओं में शराबबंदी के लिए खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। डही, कुक्षी व निसरपुर विकासखंड के चार ग्रामों में महिलाओं ने एकजुटता दिखाकर इस सामाजिक बुराई के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है। अपने घर को टूटने से बचाने और आने वाली पीढ़ी को इससे दूर रखने की मजबूरी ने इन महिलाओं में ऐसा हौंसला भरा है कि अब वे शराब बिक्त्री को लेकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से टकराने में भी भय नहीं खाती। जागरूकता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि नशामुक्ति के लिए बाकायदा महिला समितियां बनने लगी हैं, जो पल-पल होने वाले घटनाक्रमों पर नजर रखती हैं।

गत दिवस कुक्षी तहसील के ग्राम अंबाड़ा की महिलाएं नशामुक्ति महिला समिति बनाकर आगे आई थीं और उन्होंने पुलिस और एसडीएम को ज्ञापन दिया। इसमें समिति अध्यक्ष लीलाबाई ने यह चेतावनी तक दी कि शराब बिक्त्री पर यदि रोक नहीं लगी तो समिति अपनी ओर से अर्थदंड लगाएगी। इसी प्रकार निसरपुर में भी महिलाओं ने पुलिस चौकी का घेराव किया जो करीब 3 घटे तक जारी रहा। इसके अलावा कुक्षी तहसील के ही दोगांव और पड़ियाल क्षेत्र की महिलाएं भी इसी तरह नशामुक्ति को लेकर आगे आ चुकी हैं।

दरअसल इस अभियान के लिए जागरूकता लाने में पंचायती राज में महिलाओं को मिले 50 फीसदी आरक्षण का भी महत्वपूर्ण रोल है। दोगांवा की सरपंच सरस्वती पटेल के मुताबिक हम सभी महिलाएं परेशान हो चुकी थीं, इसलिए पास ही के ग्राम पड़ियाल का उदाहरण देखकर यहां भी पहल की। बाकायदा पंचायत भवन में बैठक बुलाई गई। इसके बाद ठहराव प्रस्ताव कर सचिव को कार्रवाई करने के लिए कहा गया। इसके अलावा हमने एक समिति भी बनाई। वहीं दूसरे गांव दोगांवा की समिति अध्यक्ष शैलाबाई ने बताया कि हमने पड़ियाल से प्रेरणा ली थी और अब हमारे गांव से ग्राम कोणदा ने प्रेरणा ली है। यह बहुत अच्छा है कि अब आसपास क्षेत्र की महिलाएं प्रेरणा लेने लगी हैं।
इसी तरह दूसरे आदिवासी बहुल जिले शहडोल के ब्यौहारी क्षेत्र के गांव हथवार की महिलाओं ने अपने गांव को नशामुक्त घोषित कर ही दम लिया।

इसके पहले यहा के पुरुष शराब की लत में डूबे थे। अब आलम यह है कि पुरुष शराब के अलावा अन्य नशा करने से भी डरते हैं। यदि कोई पुरुष शराब पीकर आ जाता है तो महिलाएं उसे घर के अंदर तब तक नहीं घुसने देतीं, जब तक वह शराब छोड़ने की कसम नहीं खाता। गत वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ग्राम पंचायत हथवार में कार्यक्त्रम आयोजित किया गया। इसमें महिलाओं के सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वे गाव को नशामुक्त बनाएं। गाव की सरपंच रामरती बैगा ने प्रस्ताव स्वीकर कर गाव को नशामुक्त बनाने का संकल्प लिया। लगभग पाच सौ आबादी के इस गाव की सरपंच बैगा फº से कहती हैं कि उनके गाव में अब कोई शराब नहीं पीता है। बैगा ने कहा कि शराब बंदी के लिए एक समिति भी बनाई गई है, जिसके माध्यम से इस कार्यक्त्रम की निगरानी भी की जाती है।

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