रविवार, 6 नवंबर 2011

कुर्बानी का प्रतीक है ईद-उल-जुहा

आज ईद - उल - जुहा का त्योहार है। दरअसल , मुसलमानों के दो ही बड़े त्योहार होते हैं। पहला ईद - उल - फित्र और दूसरा ईद - उल - जुहा। मजे की बात यह है कि दूसरे संप्रदायों के भाई लोग इनके बीच का फर्क नहीं समझ पाते। ईद - उल - जुहा मनाने के तौर - तरीके और इसके पीछे की मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं फिरोज बख्त अहमद -

मीठी ईद और बकरा ईद में फर्क
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक , जो पहली ईद आती है , वह ईद - उल - फित्र है। इसे मीठी ईद या सेवइयों वाली ईद भी कहा जाता है। असलियत में यह ईद रमजान के 29 या 30 रोजों के बाद आती है और उन लोगों के लिए एक इनाम होती है जिन्होंने पूरे महीने रोजे रखे। ईद - उल - फित्र पर एक खास रकम गरीबों को दी जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से जान और माल की सुरक्षा बनी रहती है। परिवारमें सभी लोगों का फितरा दिया जाता है , जिसमें पौने दो किलो गेहूं दिया जाता है। इसे मीठी ईद इसलिए कहा जाता है कि रोजों के बाद ईद पर जिस पहली चीज का सेवन किया जाता है , वह मीठी होती है। वैसे मिठाइयों के लेन - देन , सेवइयों और शीर खुर्मा के कारण भी इसे मीठी ईद कहते हैं।

जहां तक ईद - उल - जुहा या ईद - उल - आहा या बकरा ईद की बात है तो यह हर साल मीठी ईद के करीब दो महीने बाद आती है। इसे ईद - ए - कुर्बां भी कहा जाता है , क्योंकि इस दिन जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इसका एक और नाम सुन्नत - ए - इब्राहीमी भी है क्योंकि इस त्योहार का नाम हजरत इब्राहीम के नाम से जुड़ा है। इसे नमकीन ईद भी कहा जाता है। वैसे , बड़ी ईद ( ईद - उज़ - जुहा ) और छोटी ईद ( ईद - उल - फित्र ) दोनों अलग होते हुए भी सामाजिक रूप से एक सी होती हैं। विशेष ईद की नमाज पढ़ना , पकवानों का बनना , मित्रों में मिठाई बांटना , नए कपड़े पहनना , सगे - संबंधियों के घर जाना आदि दोनों में होते हैं।

बकरा ईद पर ब्लॉग : कृपया जियो और जीने दो

शब्द बकरा ईद कहां से आया ?
वैसे इस शब्द का बकरों से कोई संबंध नहीं है। न ही यह उर्दू का शब्द है। असल में अरबी में ' बक़र ' का अर्थ है बड़ा जानवर जो जि़बह किया ( काटा ) जाता है। उसी से बिगड़कर आज भारत , पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे ' बकरा ईद ' बोलते हैं। ईद - ए - कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना। अरबी में ' क़र्ब ' नजदीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं मतलब इस मौके पर भगवान इंसान के बहुत करीब हो जाता है। कुर्बानी उस पशु के जि़बह करने को कहते हैं जिसे 10, 11, 12 या 13 जि़लहिज्ज ( हज का महीना ) को खुदा को खुश करने के लिए ज़िबिह किया जाता है। कुरान में लिखा है : हमने तुम्हें हौज़ - ए - क़ौसा दिया तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो।

क्यों काटते हैं जानवरों को
कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर बेगुनाह और मासूम जानवरों का क्या कुसूर है जो उन्हें बेदर्दी से काट दिया जाता है ? वे समझते हैं कि इस्लाम जल्लादों और कसाइयों का धर्म है। लोगों का ऐसा सोचना ठीक नहीं है क्योंकि मासूम जानवरों के कटते गलों और बहते खून को देखना भला कौन पसंद करेगा ? जब लेखक भी अपने घर कुर्बानी करता है तो उसके बच्चे बड़ी चीख - पुकार करते हैं कि इतने प्यारे बकरों को आखिर क्यों काटा जा रहा है ? वे पूछते हैं कि क्या मैं जल्लाद हूं जो बकरों को काट रहा हूं ? अब उन्हें क्या जवाब दिया जाए ? उन्हें मनाना पड़ता है कि यह सब खुदा को खुश करने के लिए किया जा रहा है। फिर उनसे छिपाकर कुर्बानी की जाती है।

कुर्बानी का मतलब क्या है
कुर्बानी का मतलब है बकरा ईद के दिन ऊंट , बकरे जैसे जानवरों को जि़बह कर देना। यह ठीक है लेकिन इस्लाम धर्म क़ौम से जीवन के हर क्षेत्र में कुर्बानी मांगता है। इस्लाम के प्रसार में धन व जीवन की कुर्बानी , नरम बिस्तर छोड़कर कड़कती ठंड या जबर्दस्त गर्मी में बेसहारा लोगों की सेवा के लिए जान की कुर्बानी भी खास मायने रखती है। कुर्बानी का असली मतलब यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए दिया गया हो। जानवरों की कुर्बानी महज एक प्रतीक है।

किन जानवरों की होती है कुर्बानी
वैसे कुर्बानी के लिए ऊंट , भेड़ आदि भी बताए गए हैं पर भारत में इनका चलन बहुत कम है। कुर्बानी करने के कुछ उसूल भी हैं जैसे वह पशु कुर्बान नहीं किया जा सकता जिसमें कोई शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो , सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो या जो शारीरिक तौर से बिल्कुल दुबला - पतला हो। बहुत छोटे पशु की भी बलि नहीं दी जा सकती। कम - से - कम उसे दो दांत ( एक साल ) या चार दांत ( डेढ़ साल ) का होना चाहिए। कुर्बानी ईद की नमाज के बाद की जाती है और मांस के तीन हिस्से होते हैं। एक खुद के इस्तेमाल के लिए , दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए। वैसे , कुछ लोग सभी हिस्से गरीबों में बांट देते हैं।

बहुत से लोग समझते हैं कि मुसलमान गाय का भी वध करते हैं। असल में ऐसा नहीं हैं क्योंकि हर मुगल शहंशाह ने अपने दौर में फतवा जारी किया था कि गाय का वध न किया जाए क्योंकि बिरादरान - ए - वतन ( हिंदू ) के लिए गाय पावन है और माता समान है। इसका वध करना हिंदू भाइयों का दिल दुखाना है। बहादुर शाह जफर तो ऐसे लोगों को सजा देते थे जो बकरा ईद वाले दिन गाय का वध करते थे।

कुर्बानी पर जानकारों की राय
वरिष्ठ मुस्लिम विचारक अजीज बर्नी कहते हैं कि बच्चों की बात अलग है , लेकिन ईद की कुर्बानी के बारे में ऐसा विचार ठीक नहीं है। खुदा ने इस ब्रह्मांड की रचना करते समय हर तरह के काम विशेष नाप - तोल करके बनाए हैं। अगर ईद - उज - जुहा के मौके पर जानवरों की कुर्बानी न दी जाए , तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो जाएगी कि इंसान के रहने के लिए जगह ही नहीं बचेगी।

इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सचिव डॉक्टर ख्वाजा इफ्तखार अहमद का मानना है कि कुर्बानी की परंपरा इस दुनिया की नींव पड़ते समय से ही चली आ रही है। जब हम सब्जियां , फल या ड्राई फ्रूट्स खाते हैं तो क्या हम उन्हें पेड़ - पौधों से उखाड़कर उनका वध नहीं करते ? वैसे यहां बहस इस बात की नहीं है कि एक प्रकार की कुर्बानी को सही ठहराने के लिए दूसरी कुर्बानी का उदाहरण दिया जाए। इंसान कुर्बानी सिर्फ जानवरों की ही नहीं देता बल्कि अपने समय , पैसे और विचारों आदि की भी देता है।

इसी तरह एक और धार्मिक विचारक डॉक्टर जाकिर नायक का तथ्य है कि ईश्वर ने मनुष्य को दोनों तरह के दांत दिए हैं , सब्जी खाने के भी और मांस खाने के भी। जो शाकाहारी जानवर होते हैं , उनके दांत चपटे होते हैं , क्योंकि वे घास खाते हैं। मांसाहारी जानवरों के दांत बड़े पैने और धारदार होते हैं। इसके अलावा अब जब इंसान के पास दोनों तरह के दांत हैं तो वह गोश्तखोर और सब्जीखोर दोनों ही है। वैसे अगर कोई मुसलमान चाहे तो वह सिर्फ सब्जी खाकर भी जीवन बिता सकता है। शाकाहारी पशु सिर्फ सब्जी ही खा सकते हैं और मांसाहारी सिर्फ मांस , जबकि इंसान के दांत पैने और चपटे दोनों ही प्रकार के होते हैं इसलिए वह दोनों चीजें खा सकता है।

खास क्यों हैं भारतीय ईद
ऐसे तो इस पावन पर्व की नींव अरब में पड़ी , लेकिन तुजक - ए - जहांगीरी में लिखा है : ईद मनाने का जो जोश , खुशी और उत्साह भारतीय लोगों में है , वह तो समरकंद , कंधहार , बगदाद और तबरेज जैसे शहरों में भी नहीं पाया जाता जहां इस्लाम का आगमन भारत से पहले हुआ। यह बात सोलह आने सच है कि न सिर्फ अकबर व जहांगीर के समय में , बल्कि आज भी ईद का असली मजा भारत में ही देखने को मिलता है। ईद वाले रोज ऐसा लगता है मानो यह मुसलमानों का ही नहीं , बल्कि हर भारतीय का पर्व है।

कैसे लगता है बकरा बाजार
बकरा ईद से लगभग दो हफ्ते पहले ही बाजारों में बकरों की रेल - पेल शुरू हो जाती है। देहातों से चरवाहे बड़े शहरों में अपने जानवरों को बेचने के लिए लाते हैं। बकरों को सेहतमंद और मोटा - ताजा बनाने के लिए बड़े कठिन जतन किए जाते हैं। बड़े शहरों जैसे मुंबई , कोलकाता , पटना , दिल्ली आदि में इन बकरों को बेचने के लिए खास मैदान होते हैं जहां शहर के लोग जाते हैं और दाम देकर इन्हें ले आते हैं। दिल्ली में यह विशेष ' बकरा हाट ' जामा मस्जिद के सामने उर्दू पार्क या मौलाना आजाद पार्क में लगती है , जिसे बकरा मंडी कहा जाता है। पिछले कई साल से बकरे बेचने वालों का बड़ा शोषण किया जा रहा है। बकरा मंडी में जरा - सी जगह या बिजली के एक बल्ब के लिए इनसे हजारों , लाखों रुपये ऐंठ लिए जाते हैं। अभी हाल ही में बकरा मंडी के सताए बकरे वालों ने जामा मस्जिद में पोस्टर भी निकाले कि इलाके के नेता उन्हें परेशान कर रहे हैं।

ईद - उल - जुहा से संबंधित शब्द और उनके अर्थ
सन्नत - ए - इब्राहीमी : वह काम जो हजरत इब्राहीम ने शुरू किया यानी बकरों की कुर्बानी।
अदंत बकरा : एक साल से छोटा और छोटे दांतों वाला बकरा।
दो दांत वाला बकरा : एक साल का बकरा , जिसके दो दांत होते हैं।
चार दांत वाला बकरा : तीन - चार साल का बकरा , जिसके चार दांत होते हैं।
खुतबा : नमाज के पहले और बाद में इमाम साहब का व्याख्यान।

क्या है इतिहास
ईद - उल - जुहा का इतिहास हजरत इब्राहीम से जुड़ा है। हजरत इब्राहीम कई हजार साल पहले ईरान के शहर ' उर ' में पैदा हुए थे। जिस वातावरण में उन्होंने आंखें खोलीं , उस समाज में कोई भी बुरा काम ऐसा न था जो न हो रहा हो। उन्होंने आवाज उठाई तो कबीले वाले दुश्मन बन गए। उनका जीवन जनसेवा में बीता। 90 साल की उम्र में भी उनकी औलाद नहीं हुई तो खुदा से उन्होंने प्रार्थना की और उन्हें चांद सा बेटा इस्माईल मिल गया। इस्माईल की उम्र 11 साल भी न होगी कि हजरत इब्राहीम को एक सपना आया। उन्हें आदेश हुआ कि खुदा की राह में कुर्बानी दो। उन्होंने अपने प्यारे ऊंट की कुर्बानी दी। फिर सपना आया कि अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो। उन्होंने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। तीसरी बार वही सपना फिर आया। वह समझ गए कि अल्लाह को उनके बेटे की कुर्बानी चाहिए। वह जरा भी न झिझके और पत्नी हाजरा से कहा कि नहला - धुलाकर बच्चे को तैयार करें। जब वह इस्माईल को बलि के स्थान पर ले जा रहे थे तो इब्लीस ( शैतान ) ने उन्हें बहकाया कि क्यों अपने जिगर के टुकड़े को मारने पर तुले हो मगर वह न भटके। छुरी फेरने से पहले नीचे लेटे बेटे ने बाप की आंखों पर रुमाल बंधवा दिया कि कहीं ममता आड़े न आ जाए। बाप ने छुरी चलाई और आंखों से पट्टी उतारी तो हैरान हो गए। बेटा तो उछल - कूद कर रहा है और उसकी जगह एक भेड़ की बलि खुदा की ओर से कर दी गई है। हजरत इब्राहीम ने खुदा का शुक्रिया अदा किया।

तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जिलहिज्ज के इस महीने में जानवरों की बलि दी जाती है। न तो अल्लाह को हजरत इस्माईल की बलि चाहिए थी और न ही जानवर का खून। यह प्रथा तो खुदा ने केवल सच्ची निष्ठा , प्यार और हर कुर्बानी के लिए तैयार रहने की भावना को परखने के लिए चलाई थी। Date7-11-2011

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