भोपाल। राज्य सरकार को भोपाल में एक अजीब संकट से गुजरना पड़ रहा है। पूरे प्रदेश में भले ही वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं को पूरा करने का दावा करे, लेकिन भोपाल में ऐसा नहीं हो पा रहा है। यहां तक कि संघ परिवार के एजेंडे से जुड़ी घोषणाएं भी नगर निगम के कारण मूर्त रूप नहीं ले सकी हैं। यहां महापौर भाजपा का होने के बाद भी पार्षदों की कम संख्या के चलते पार्टी की फजीहत हो रही है। इस स्थिति के लिए पार्टी के नेता और विधायकों को जिम्मेदार माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में देश के सबसे बडे़ तालाब में इसका निर्माण कराने वाले राजा भोज की प्रतिमा का अनावरण किया था। उस मौके पर उन्होंने भोपाल का नाम भोजपाल और तालाब किनारे की सड़क का नाम राजा भोज मार्ग करने की घोषणा की थी। ये शायद भाजपा के लिए शर्मिदगी का विषय हो कि वह राजधानी कि नगर निगम में इस प्रस्ताव को पास नहीं करा पाई।
भोजपाल के प्रस्ताव को तो निगम परिषद ने पहले ही निरस्त कर दिया था। अब सड़क के नाम पर उसे कांग्रेस से समझौता करना पड़ा है। ऐसा ही डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी रोड के मामले में हुआ। दोनों ही सड़कें आधी-आधी क्रमश: राजीव गांधी और अर्जुन सिंह के नाम से भी जानी जाएंगी। ऐसा इसलिए हुआ कि भाजपा को नगर निगम चुनाव में भोपाल में हार का सामना करना पड़ा था।
डेढ़ साल पहले जब चुनाव हुए तो भोपाल में भाजपा के छह विधायक थे। पिछली छह बार से भाजपा का सांसद रहा है, लेकिन भाजपा यहां 70 में से सिर्फ 28 पार्षद ही जिता सकी। भाजपा ने महापौर का चुनाव कैसे जीता ये कांग्रेस नेतृत्व के साथ सरकार को भी मालूम है। तीस हजार से ज्यादा मतों के निरस्त होने के बाद भाजपा महापौर का चुनाव पन्द्रह हजार वोटों से जीत पाई थी।
अब निगम में हो रहे फैसलों से भाजपा नेतृत्व को अपनी गल्तियों का अहसास हो रहा है। यदि उस वक्त नेतृत्व कुछ करता तो आज उसे पार्टी की इतनी फजीहत नहीं देखना पड़ती। कारण पार्षद टिकट वितरण के दौरान विधायकों के दबाव के आगे पार्टी झुक गई थी। रही सही कसर प्रदेश के नेताओं ने पूरी कर दी थी। जब चुनाव नतीजे आए तो भाजपा भौंचक थी। वरिष्ठ मंत्री बाबूलाल गौर के निर्वाचन क्षेत्र से 12 में से छह पार्षद ही जीते थे, जबकि गौर की पुत्रवधु कृष्णा गौर महापौर का चुनाव लड़ रही थीं। गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता के इलाके से भी आधा दर्जन पार्षद ही जीत पाए। प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष ध्रुव नारायण सिंह की सीट से 16 में से पांच पार्षद ही भाजपा के बने। विधायक विश्वास सारंग के निर्वाचन क्षेत्र में 13 में से तीन पार्षद बने। जितेंद्र डागा के प्रतिनिधित्व वाली ग्रामीण बहुल हुजूर सीट में चार में से तीन सीटों पर भाजपा जीती और उत्तर भोपाल में 15 में से पांच पर ही उसे जीत नसीब हुई।
अब नगर निगम में लगातार गिरते प्रस्तावों और मुख्यमंत्री की घोषणाओं के पूरा नहीं होने पर पार्टी में गड़े मुर्दे उखड़ने शुरू हुए हैं। पार्टी में अंदरखाने ये बात चल रही है कि कैसे नगर निगम में पार्टी की मंशा के अनुरूप काम किए जाएं। पार्टी के कई नेता इस स्थिति के लिए विधायकों को ही जिम्मेदार मान रहे हैं।
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